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BREAKING : महंगे LPG सिलेंडर का झंझट नहीं, मात्र 296 रुपये में अनलिमिटेड गैस सप्लाई

 

ऐसे समय में जब एलपीजी गैस सिलेंडर के दाम एक हजार रुपये को छू चुके हैं, हरियाना कस्बा के गांव लांबड़ा कांगड़ी के घरों में मात्र 296 रुपये में अनलिमिटेड गैस सप्लाई हो रही है। आप सोच रहे होंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है। हम बताते हैं। यह कमाल है सहकारी समिति का, जो बायोगैस प्लांट बनाकर 50 घरों में बहुत कम कीमत पर बायोगैस की सप्लाई कर रही है। 2015 में बने प्लांट से गैस सप्लाई के लिए गांव में दो हजार मीटर लंबी पाइप लाइन बिछाई गई है। गैस गोबर से तैयार होती है और इसके लिए गोबर भी गांव के लोगों से ही लिया जाता है। एक क्विंटल गोबर के लिए उन्हें आठ रुपये दिए जाते हैं।


गोबर इकट्ठा करने के लिए विशेष गाड़ी घर-घर जाती है। गांव में करीब 300 घर हैं, लेकिन पायलट प्रोजेक्ट होने के कारण अभी इसे सिर्फ 50 घरों में ही शुरू किया गया है। लोगों को एक महीने के लिए 296 रुपये का भुगतान करना होता है। इसके लिए उन्हें अनलिमिटेड गैस सप्लाई दी जाती है। प्लांट से निकलने वाला गोबर का घोल खाद के रूप में 600 रुपये से 800 रुपये प्रति 5000 लीटर में बेचा जाता है। सस्ती खाद मिलने से लोगों का यूरिया व अन्य प्रकार का खर्च भी बच जाता है।

समिति के सचिव जसविंदर सिंह कहते हैं, समिति 1920 में शुरू हुई थी। इसका पंजीकरण लाहौर में हुआ था। यह 102 साल से लगातार चल रही है। लाहौर में पंजीकरण का पत्र आज भी समिति के पास मौजूद है। बंटवारे के बाद इसका मुख्य दफ्तर पहले जालंधर और बाद में चंडीगढ़ शिफ्ट कर दिया गया।

-किसान से गोबर की खरीद: आठ रुपये प्रति क्विंटल

-एक क्विंटल गोबर से गैस उत्पादन: चार क्यूबिक मीटर यानी 40 रुपये।

-एक क्विंटल गोबर की खाद से कमाई: 32 रुपये

-लेबर, ढुलाई, मरम्मत, वेतन पर प्रति क्विंटल खर्च: 54

-प्रति क्विंटल गोबर पर मुनाफा: 18 रुपये।

सारे खर्च निकालकर समिति का सालाना मुनाफा एक से डेढ़ लाख रुपये के बीच है। इस पैसे को समिति कम ब्याज पर किसानों को कर्ज पर देती है। इससे भी समिति को आय हो जाती है।

समिति के सचिव जसविंदर सिंह ने बताया कि साल 2014 में वह दक्षिण कोरिया में हुई एक वर्ल्ड कांफ्रेंस में शामिल हुए थे। वहां गांवों में कचरे को रिसाइकिल करने व बायोगैस तैयार करने का प्रबंधन देकर वह हैरान रह गए। वहां से लौट कर उन्होंने अपने गांव में कचरे को रीसाइकिल करने के साथ-साथ बायोगैस प्लांट लगाया।

इसी समिति से प्लान लेकर हरियाणा की प्रदेश सरकार ने इसे पूरे प्रदेश के सभी गांवों में ऐसे प्लान लगाने पर मुहर लगा दी है। हरियाणा सरकार हर गांव को प्लांट लगाने के लिए ग्रांट भी देगी। हिसार के नया गांव में 90 लाख रुपये से प्लांट लगाया गया है।

जसविंदर सिंह ने बताया कि देश के अन्य हिस्सों में यह प्रयोग सफल नहीं हुआ था। जब उन्होंने पंचायती राज विभाग के सामने प्रोजेक्ट का प्लान रखा तो वह आनाकानी करने लगे और साफ कह दिया कि इसमें पैसा ही बर्बाद होगा, लेकिन समिति की इच्छा शक्ति को देखते हुए पायलट प्रोजेक्ट मंजूर हो गया। इस प्लांट पर 32 लाख रुपये का खर्च आया।

प्लांट लगने के बाद गैस को घरों तक पहुंचाने में समस्या आ रही थी। गांव की सभी सड़कें कंक्रीट की हैं, इसलिए दोबारा सड़क तोड़कर पाइप लाइन बिछाना काफी महंगा साबित होता। इसलिए घरों की दीवारों के साथ साथ पाइप बिछाई गई, जिनके माध्यम से गैस लोगों के घर तक पहुंचती है। इसके प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए प्लांट में कंप्रेशर भी लगाया गया है। इसके लिए साधारण गैस चूल्हा ही इस्तेमाल होता है।

बायोगैस प्लांट के मुख्य रूप से चार हिस्से हैं। पहले हिस्से में छोटा खुला टैंक है, जिसमें गोबर डालकर उसे घोला जाता है। इसके बाद यह पहले चैंबर में डाला जाता है। यहां से यह मुख्य भूमिगत टैंक में प्रवेश करता है। इसी टैंक में गैस बनती है। टैंक का आकार 200 वर्ग मीटर है। इसके ऊपर मिट्टी डाल कर पार्क बना दिया गया है। गैस के प्रेशर से गोबर का घोल एक अन्य चैंबर से होते हुए बाहर खुले पिट में चला जाता है। इस घोल को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। 25 किलो गोबर से एक क्यूबिक मीटर गैस तैयार होती है। प्लांट की प्रति दिन की क्षमता 100 क्यूबिक मीटर है। एक घर में डेढ़ से दो घन मीटर गैस का रोजाना इस्तेमाल हो जाता है। इसके अलावा यहां से गुरुद्वारा साहिब और समिति के दफ्तर को भी कनेक्शन दिया गया है।

गैस की खपत जानने के लिए हर घर में रीडिंग मीटर भी लगाए गए हैं। गांव सिमरनजीत कौर, कमलजीत कौर व शरनजीत कौर ने बताया कि उनका खर्च काफी कम हो गया है। पहले गैस खत्म होती थी, तो सिलेंडर भरवाने के लिए इंतजार करना पड़ता था। चूल्हा जलाना पड़ता था, लेकिन अब 24 घंटे गैस की सप्लाई मिलती है। गोबर के पैसे गैस के बिल में एडजस्ट कर लिए जाते हैं। बिल चुकाने के बाद भी उन्हें गोबर से कमाई हो जाती है। 

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