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बिहार: मिड डे मील के अनाज के 1.27 लाख बोरे भी गटक गये, 12.72 करोड़ की चपत

 

मध्याह्न भोजन योजना के रुपये व अनाज गटकने के मामले गाहे-बगाहे सामने आते रहे हैं। इस बार मध्याह्न भोजन योजना के तहत बिहार के स्कूलों में दोपहर का भोजन बनाने के लिए भेजे गये अनाज के बोरों के रुपये ही हजम कर लेने का मामला सामने आया है। बिहार के महालेखाकार की ऑडिट रिपोर्ट में यह गड़बड़ी उजागर हुई है।

एमडीएम के रिकॉर्ड की नमूना ऑडिट रिपोर्ट में जो तस्वीर सामने आयी है, उससे राज्य मुख्यालय सहित जिले के कार्यक्रम पदाधिकारी भी सकते में आ गये हैं। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष 2014-15 और 15-16 में एक करोड़ 27 लाख 27 हजार 588 बोरों की बिक्री नहीं की गयी है। इससे 12 करोड़ 72 लाख 75 हजार 891 रुपये (लगभग 13 करोड़) राजस्व का घाटा हुआ है।

ऑडिट रिपोर्ट आने के बाद बिहार राज्य मध्याह्न भोजन योजना समिति सक्रिय हुई है। समिति ने एमडीएम के निदेशक से बिहार के सभी जिला कार्यक्रम पदाधिकारियों से बोरों की बिक्री से प्राप्त हुई आय की रिपोर्ट की मांग की है। बताया जाता है कि वित्तीय वर्ष 2014-15 के लिए भारत सरकार की ओर से बिहार के 38 जिलों में 35692.67 मीट्रिक टन अनाज का आवंटन हुआ था। इसमें 71 लाख 38 हजार 853 बोरों का इस्तेमाल हुआ था। प्रति बोरे की बिक्री 10 रुपये की दर से करनी थी। इस तरह इन बोरों की बिक्री से सात करोड़ 13 लाख 88 हजार 533 रुपये का राजस्व प्राप्त होना था। वहीं 2015-16 में भारत सरकार की ओर से 279436.79 मीट्रिक टन अनाज का आवंटन हुआ था। इसमें 55 लाख 88 हजार 735 बोरों का इस्तेमाल हुआ था। इन बोरों की बिक्री से सरकार व विभाग को पांच करोड़ 58 लाख 87 हजार 358.65 रुपये राजस्व प्राप्त होने की उम्मीद थी।

रिपोर्ट मांगे जाने पर चकराये अधिकारी

एक सप्ताह में फॉर्मेट में बोरों का हिसाब भरकर भेजे जाने के निर्देश के बाद अधिकारी भी चकरा गये हैं। विभिन्न स्कूलों के स्थानांतरित या रिटायर हेडमास्टरों से करीब पांच साल पहले के बोरों का हिसाब व उसकी राशि प्राप्त करना कठिन टास्क बन गया है। बताया जा रहा है कि इस अवधि में विद्यालय शिक्षा समिति के सचिव और कई स्कूलों के हेडमास्टरों का ट्रांसफर हो चुका है या वे रिटायर हो चुके हैं। ऐसे में पुराने बोरों की खोज और उससे प्राप्त हुई राशि का ब्योरा कैशबुक में दर्ज करना मुश्किल भरा कार्य माना जा रहा है।
पूर्व में दस रुपये में बोरे की बिक्री का दिया गया था निर्देश

पत्र के माध्यम से पूर्व में सभी जिलों को निर्देश दिया गया था कि खाद्यान्न के खाली बैग या बोरे को दस रुपये की दर से बिक्री कर प्राप्त राशि मध्याह्न भोजन योजना के कैश बुक में इंट्री की जाये। लेकिन, सभी जिलों के स्कूलों की ओर से इस दिशा में कदम नहीं उठाया गया। इसका नतीजा हुआ कि सरकार को कुल 12.72 करोड़ रुपये की चपत लगी है।

एक सप्ताह में तय फॉर्मेट में देनी है रिपोर्ट

ऑडिट रिपोर्ट आने के बाद सभी जिलों में मध्याह्न भोजन योजना के जिला कार्यक्रम पदाधिकारियों से एक सप्ताह में फॉर्मेट में भरकर रिपोर्ट मांगी गयी है। इसके लिए फॉर्मेट उपलब्ध भी करा दिया गया है। इसमें कुल आवंटित खाद्यान्न, बोरों की संख्या, बिक्री की गई बोरों की संख्या और बिक्री की राशि के संबंध में रिपोर्ट देनी है। निचे दी गयी खबरें भी पढ़ें
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