Himachal: कोहरे-पाले की मार, फसलें भी बीमार


हिमाचल प्रदेश इन दिनों पाला व कोहरे की जद में है। इस कारण कुछ फसलों को लाभ हो रहा है तो कुछ फसलों को नुकसान भी हो रहा है। गौर रहे कि जब पृथ्वी के धरातल तथा वायु का तापमान गिर कर इस सतर तक पहुंच जाए कि जमीन या दूसरे खुले सतहों पर वायुमंडल की नमी संघनित होकर क्रिस्टलीय बर्फ के रूप में जम जाए है, तो उसे पाला कहते हैं।

कुछ लोग जमी हुई ओस को ही पाला कहते है, परंतु यह ठीक नहीं है। पाला और जमी हुई ओस दोनों अलग-अलग कारक है। पाला के बनने की क्रिया ओस की भांति ही होती है, परंतु ओस के समय तापमान ओसांक से नीचे होता है, जबकि पाला के समय तापमान हिमांक से नीचे होता हैं। दोनों ही रात्रि या प्रातः काल की घटनाएं हैं, जिसके लिए वायु शांत व आसमान साफ होना चाहिए। एक और मौसम कारक है कोहरा, जिसको कुछ लोग पाला ही समझते है, परंतु यह भी पाला से अलग है।

जब वायु का तापमान इस स्तर तक गिर जाए कि जल वाष्प संघनित होकर पानी के कणों में बदल जाए और ये पानी के कण किसी सतह पर न जमकर हवा में ही लटके रहें, तो उसे कोहरा कहते हैं। वास्तव में यह एक प्रकार के बादल (स्ट्रेटस) होते हैं, जो या तो पृथ्वी सतह के बिलकुल नजदीक रहते हैं। इनके कारण दृश्यता बहुत कम हो जाती है। कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर ओस व कोहरा फसलों के लिए लाभदायक भी होता है, परंतु पाला सदा नुकसानदायक व घातक होता है।

डा. यशवंत सिंह परमार नौणी विवि के पर्यावरण वैज्ञानिक डा. मोहन झांगरा ने बताया कि पौधों को पाले के प्रकोप से बचाने के लिए तथा इनमें पाला को सहने करने की शक्ति को बढ़ाने के लिए कुछ रसायनों का भी प्रयोग किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि किसाल प्रोपियोनिकअम्ल 100 पीइपीइएमई का 8-10 दिन के अंतराल पर छिड़काव कर सकते हैं। News source: Divya Himachal

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