जानिए आखिर क्यों World Famous हैं हिमाचली धाम - हिमाचल से

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Himachal Se : जानिए आखिर क्यों World Famous हैं. हिमाचली धाम - हिमाचल को देवी देवताओं की भूमि कहा जाता हैं. पुरे भारत में हिमाचल प्रदेश खास  महत्त्व रखता है. यहाँ का रहन सहन, ऊँचे ऊँचे पहाड़ किसी का भी मन मोह लेता है. आज हम बात करेंगे हिमाचली धाम के बारे में जो की पुरे विश्व में मशहूर है. Himachali Dhaam


Himachali Dham क्या है 

हिमाचल में जब कोई शादी या अन्य सुबह कार्य किया जाता हैं तो मेहमानो के लिए तरह तरह के बने पकवान को हिमाचली धाम कहा जाता है. शादियों में बनने वाली धाम का स्वाद उस फाइव स्टार होटल के स्वाद को भी फेल कर देता है जो लोग हजारों रुपये देकर उसे खाते हैं। बहुत से लोग जब हिमाचल में आते हैं तो यहाँ की बनी हिमाचली धाम का जायका लेना नहीं भूलते. आपको जानकर हैरानी होगी की हिमाचल के 12 जिलों में 12 तरह की धाम परोसी जाती है. 

जानिए आखिर क्यों हिमाचली धाम सबसे अलग मानी जाती है  


  • हिमाचली धाम का स्वाद ही कुछ अलग होता है
  • पारंपरिक ढंग से धाम पकती है
  • हर क्षेत्र में अलग-अलग तरह की होती है धाम 
  • धाम की परम्परा सदियों से चली आ रही है


हिमाचली धाम का स्वाद ही कुछ अलग होता है। धाम को खाने के बाद हर कोई हिमाचल की सराहना करता है। हिमाचली धाम हिमाचल प्रदेश मैं बहुत प्रचलित है और मुख्यतः शादी और धार्मिक दिनों में काफी बनाई जाती है। 

धाम की परम्परा सदियों से चली आ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पारंपरिक ढंग से धाम पकती है। हिमाचली धाम हिमाचल प्रदेश के हर क्षेत्र में अलग-अलग तरह की होती है। हिमाचली धाम में अक्सर खुशबूदार चावल, कई प्रकार की दालें, मदरा, खट्टा, मीठा भात परोसा जाता है जिन्हें देख कर मुँह में पानी आ जाता है। धाम में 500 से 1000 लोगों तक का खाना बनाया जाता है।

खाना आमतौर पर पत्तल पर ही परोसा जाता है और किसी-किसी क्षेत्र में साथ में दोने भी रखे जाते हैं। हिमाचली खाना बनाने, परोसने व खाने की सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपरा के साथ-साथ एक कहावत भी पक चुकी है। पूरा चौका कांगड़े आधा चौका कहलूर, बचा खच्या बाघला धूढ़ धमाल हंडूर। इसके अनुसार चौके रसोई की सौ प्रतिशत शुद्धता तो कांगड़ा में ही है। कहलूर ,बिलासपुर क्षेत्र तक आते-आते यह पचास प्रतिशत रह जाती है। बचा खुचा बाघल सोलन, तक और हंडूर ,नालागढ़ क्षेत्र तक आते-आते धूल मिट्टी में जूतों समेत बैठकर खाना खा लिया जाता है।


हिमाचल के इन जिलों में इस तरह के व्यंजन Himachali Dham में पकाए जाते हैं।


कांगड़ा की धाम - 

बात करें कांगड़ा की धाम की तो यह धाम हिमाचल की धामों में नंवबर वन पायदान पर शुमार है। कांगड़ा में चने की दाल, माह उड़द ,साबुत, मदरा ,दही चना, खट्टा ,चने अमचूर, पनीर मटर, राजमा, सब्जी में जिमीकंद, कचालू, अरबी, मीठे में ज्यादातर बेसन की रेडीमेड बूंदी, बदाणा या रंगीन चावल भी परोसे जाते हैं। यहां चावल के साथ पूरी भी परोसी जाती है।

शिमला की धाम - 

प्रदेश की राजधानी शिमला के ग्रामीण अंचल से शुरू करें तो वहां माह उड़द की दाल, चने की दाल, मदरा ,स्पेशल सब्जी के रूप में दही में बनाए सफेद चने, आलू, जिमीकंद, पनीर, माहनी ,खट्टा में काला चना या पकौड़े, मीठे में बदाणा या छोटे गुलाब जामुन। मीठे के बाद और मिठाई भी परोसी जाती है। हालांकि परंपरा के मुताबिक सभी पकवान एक निश्चित क्रम से आने चाहिए मगर समय के साथ थोड़ा बहुत बदलाव कई जगह आ चुका है।

चंबा की धाम - 

चंबा में दोने भी पतल का साथ देते हैं। यहां चावल, मूंग साबुत, मदरा, माह, कढ़ी, मीठे चावल, खट्टा, मोटी सेवेइयां खाने का हिस्सा हैं। यहां मदरा हेड बोटी, खाना बनाने वाली टीम का मुखिया डालता है। किसी जमाने में बोटी पूरा अनुशासन बनाए रखते थे और खाना-पीना बांटने का सारा काम बोटी ही करते थे। एक पंगत से उठ कर दूसरी पंगत में बैठ नहीं सकते थे। खाने का सत्र पूरा होने से पहले उठ नहीं सकते थे। मगर जीवन की हड़बड़ाहट व अनुशासन की कमी ने बदलाव लाया है।


हमीरपुर की धाम - 

हमीरपुर की धाम में दालें ज्यादा परोसी जाती हैं। यहां पैसे वाला मेजबान दालों की संख्या बढ़ा देता है। मीठे में यहां पेठा ज्यादा पसंद किया जाता है मगर बदाणा व कद्दू का मीठा भी बनता है। राजमा या आलू का मदरा, चने का खट्टा व कढ़ी प्रचलित है। वहीं ऊना में सामूहिक भोज को कुछ क्षेत्रों में धाम कहते हैं कुछ में नहीं।

पहले यहां नानकों, मामकों नाना, मामा की तरफ से धाम दी जाती थी। यहां पतलों के साथ दोने भी दिए जाते हैं विशेषकर शक्कर या बूरा परोसने के लिए। यहां चावल, दाल चना, राजमा, दाल माश खिला जाते हैं। दालें वगैरह कहीं कहीं चावलों पर डलती हैं कहीं अलग से। यहां सलूणा ,कढ़ीनुमा खाद्य इसे बलदा भी कहते हैं खास लोकप्रिय है। यह हिमाचली इलाका कभी पंजाब से हिमाचल आया था सो यहां पंजाबी खाने-पीने का खासा असर है।

ऊना की धाम - 

ऊना जिले के कुछ क्षेत्रों में सामूहिक भोज को धाम कहते हैं| पहले ऊना में मामा की तरफ से धाम दी जाती थी। यहां पतलों के साथ दोने भी दिए जाते हैं विशेषकर शक्कर या बूरा परोसने के लिए। यहां चावल, दाल चना, राजमा, दाल माश खिलाए जाते हैं। यहां सलूणा ,कढ़ीनुमा खाद्य इसे बलदा भी कहते हैं खास लोकप्रिय है। हिमाचली इलाका ऊना कभी पंजाब से हिमाचल आया था तो यहां पंजाबी खाने-पीने का अधिक असर है।

बिलासपुर की धाम - 

बिलासपुर क्षेत्र में उड़द की धुली दाल, उड़द, काले चने खट्टे, तरी वाले फ्राई आलू या पालक में बने कचालू, रौंगी ,लोबिया, मीठा बदाणा या कद्दू या घिया के मीठे का नियमित प्रचलन है। समृद्घ परिवारों ने खाने में सादे चावल की जगह बासमती, मटर पनीर व सलाद भी खिलाना शुरू किया है।

मंडी की धाम - 

छोटी काशी मंडी क्षेत्र के खाने की खासियत है सेपू बड़ी जो बनती है बड़ी मेहनत से और खाई भी बड़े चाव से जाती है। यहां मीठा ,मूंगदाल या कद्दू का छोटे गुलाब जामुन, मटर पनीर, राजमा, काले चने ,खट्टे, खट्टी रौंगी ,लोबिया व आलू का मदरा ,दही लगा व झोल ,पकौड़े रहित पतली कढ़ी खाया व खिलाया जाता है।

कुल्लू की धाम - 

कुल्लू का खाना मंडीनुमा है। यहां मीठा ,बदाणा या कद्दू, आलू या कचालू खट्टे, दाल राजमा, उड़द या उड़द की धुली दाल, लोबिया, सेपू बड़ी, लंबे पकौड़ों वाली कढ़ी व आखिर में मीठे चावल खिलाए जाते हैं।

सोलन की धाम - 

सोलन के बाघल ,अर्की तक बिलासपुरी धाम का रिवाज है। उस क्षेत्र से इधर एकदम बदलाव दिखता है। हलवा-पूरी, पटांडे खूब खाए खिलाए जाते हैं। सब्जियों में आलू-गोभी या मौसमी सब्जी होती है। मिक्स दाल और चावल आदि भी परोसे जाते हैं। यहां खाना धोती पहन कर भी नहीं परोसा जाता है।

किन्नौर की धाम - 

हिमाचल में सबसे अलग धाम किन्नौर की मानी जाती है क्योंकि यहां पर कई सालों से ्र
मांसाहारी भोजन भी धाम में परोसा जाता है। किन्नौर की दावत में शराब व मांस का होना हर उत्सव में लाजिमी है। हालांकि शाकाहारी बढ़ रहे हैं। इसलिए यहां बकरा कटता ही है। खाने में चावल, पूरी, हलवा, सब्जी जो उपलब्ध हो बनाई जाती है।

लाहौल-स्पीति की धाम - 

लाहौल-स्पीति का माहौल ज्यादा नहीं बदला। वहां तीन बार मुख्य खाना दिया जाता है। चावल, दाल चना, राजमा, सफेद चना, गोभी आलू मटर की सब्जी और एक समय भेडू ,नर भेड़, का मीट कभी फ्रायड मीट या कलिचले। सादा रोटी या पूरी भटूरे जैसी जिसके लिए रात को आटा गूंथ कर रखते हैं खाते हैं। परोसने के लिए कांसे की थाली, शीशे या स्टील का गिलास व तरल खाद्य के लिए तीन तरह के प्याले इस्तेमाल होते हैं। नमकीन चाय, सादी चाय व सूप तीनों के लिए अलग से।

सिरमौर की धाम -

सिरमौर के एक तरफ हरियाणा व साथ-साथ उत्तराखंड लगता है। इसलिए यहां के मुख्य शहरी क्षेत्रों में सिरमौर का पारंपरिक खाना सार्वजनिक उत्सवों व विवाहों में तो गायब ही रहता है। भीतरी ग्रामीण इलाकों में चावल, माह की दाल, पूड़े, जलेबी, हलवा या फिर शक्कर दी जाती है। इस बदलाव के जमाने में जहां हमने अपनी कितनी ही सांस्कृतिक परंपराओं को भुला दिया है। वहीं हिमाचली खानपान की समृद्ध परंपरा बिगड़ते छूटते भी काफी हद तक बरकरार है।

तो दोस्तों ये थी जानकारी हिमाचली धाम के बारे में। हिमाचली ख़बरों के लिए हमारी वेबसाइट के साथ जुड़े रहें. आप हिमाचल के किस जिले से हैं कमेंट करके जरूर बताये. 

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